परिवार की खुशी के लिए जरूरी है मां का खुश रहना

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ज्यादातर महिलाएं चालीस की उम्र के बाद बदलाव के मानसिक दौर से गुजरती हैं। दरअसल भारतीय महिलाएं युवावस्था के दौरान खुद को परिवार के प्रति समर्पित कर देती हैं। परिवार को संभालने के चक्कर में खुद की सेहत को नजरअंदाज करती हैं और इस भाग-दौड़ भरी लाइफस्टाइल का असर आगे चलकर उनकी सेहत पर साफ दिखाई देता है।

जीवन के सुनहरे दिन तो पति और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाने में बीत जाते हैं। पता ही नहीं चलता कब आप तीस पार करके चालीस की हो गईं। अचानक एहसास होता है कि आप बुढ़ापे की ओर बढ़ रही हैं। बाल पक रहे हैं, घुटनों में दर्द शुरू हो गया है और चेहरे की चमक कम हो रही है।

शरीर में हो रहे ये बदलाव महिलाओं को भावनात्मक रूप से भी कमजोर करने लगते हैं। सच तो यह है कि चालीस की उम्र के बाद महिलाओं को अपने घर-परिवार में भी नए बदलावों से रूबरू होना पड़ता है। बच्चे बड़े होने लगते हैं। अब उन्हें पहले की तरह मां की जरूरत नहीं रहती। वे अपनी दुनिया में मस्त हो जाते हैं।

ऐसे में महिलाओं में पनपती है नीरसता की भावना। अचानक वे भरे-पूरे परिवार में भी खुद को अकेला महसूस करने लगती हैं। वैसे तो यह समस्या कामकाजी और घरेलू महिलाओं दोनों में ही देखी जाती है। पर यदि महिला की जिन्दगी केवल घर तक सीमित हो तो मामला और गंभीर हो सकता है।

अकेलापन भी बढ़ जाता है

यह उम्र का वह पड़ाव है जब बच्चे कॉलेज जाने लगते हैं और अपनी दिनचर्या में बिजी हो जाते हैं। आज के कंपटीशन के जमाने में पढ़ाई व करियर को लेकर उनकी भागदौड़ शुरू हो जाती है। उनके अपने दोस्त होते हैं जिनके साथ वे अपने अंदाज में वक्त बिताना पसंद करते हैं। ऐसे में महिलाओं को अकेलापन महसूस होने लगता है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो चालीस से पचास साल की उम्र के बीच महिलाओं को विशेष भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है। जाहिर है कि यह जिम्मेदारी पति, बच्चे और कुछ खास दोस्त ही निभा सकते हैं।

मां के लिए क्या करें

युवा बच्चे उम्र के इस दौर में अपनी मां की जिंदगी को खुशहाल बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वे अपने कॉलेज के किस्से मां से शेयर कर सकते हैं। उन्हें अपने दोस्तों से मिलवाकर उन्हें अपनी नई दुनिया में शामिल कर सकते हैं। अगर मां को पढ़ने का शौक है तो उन्हें उनकी मनपसंद किताब गिफ्ट करें। टीवी पर उन्हें अपनी पसंद के कार्यक्रम देखने के लिए प्रेरित करें। घर के छोटे-मोटे काम में मां की मदद जरूर करें।

युवा बच्चों की खूबसूरत दुनिया होती है। यकीनन बच्चों का साथ उनके उदासीन जीवन में नई तरंग और उत्साह भर देगा। उम्र के इस दौर में महिलाओं को बच्चों के भविष्य की चिंता सताने लगती है। ऐसे में बच्चों को चाहिए कि वे मां को अपने व्यवहार से आश्वस्त करें कि वे भविष्य की अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझते हैं।

बच्चे अपनी मां को भरोसा दिला सकते हैं कि आने वाले दिनों में वे न केवल खुद को संभाल सकते हैं बल्कि माता-पिता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। यदि मां अपनी खराब सेहत के बावजूद बच्चों की देखरेख में कोई नहीं छोड़ती है तो बच्चों को भी चाहिए कि वे मां की सेहत का ध्यान रखेंं।

बेहतर होगा कि वे मां को व्यायाम करने के लिए प्रेरित करें। हो सके तो सुबह-शाम मां के संग टहलने के लिए वक्त निकालें। इससे मां की सेहत तो अच्छी होगी ही साथ ही मां और बच्चों के बीच बेहतर संवाद भी कायम होगा। संवाद और सहयोग का यह सिलसिला मां के जीवन को खुशियों से भर देगा। जाहिर है अगर मां खुश होगी तो परिवार भी खुशहाल होगा।