भगवान पर चढ़ाए गए फूल-मालाओं को कहां विसर्जित करें

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शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जहां पूजा-अर्चना न होती हो। यह संभव है प्रतिदिन न होती हो, पर सप्ताह में एक बार तो अवश्य होती होगी। हम जितनी श्रद्धा भगवान में रखते हैं उतनी ही श्रद्धा हमारे मन में भगवान को चढ़ाए गए फूलमाला के प्रति होती है।

हमारी भावना भी यही होती है कि भगवान को चढ़ाए गए फूलमाला का अनादर न हो सके। इस कारण हम इन फूल-मालाओं को नदी बावड़ी कुएं या तालाब में विसर्जित करते हैं। आदर की इस भावना के साथ हमें पता भी नहीं चलता और हम एक पाप कर बैठते हैं, जिसके दुष्परिणामों से हम स्वयं भी प्रभावित होते हैं। हम निर्माल्य को नदी, तालाब या कुओं में विसर्जित कर जल को प्रदूषित ता करते ही हैं, साथ ही उस नदी, तालाब और कुएं के अस्तित्व को समाप्त करने में भी अनजाने में सहयोगी बन बैठते हैं।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि निर्माल्य को नदी, तालाब या कुओं में विसर्जित नहीं करें तो कहां पर इनको विसर्जित करें?

हमारे शास्त्रों और ग्रन्थों में निर्माल्य को नदी, तालाब, कुएं या किसी पवित्र जलस्रोत के अलावा पीपल व बड़ आदि पेड़ों की जड़ों में भी विसर्जित करने का विधान बताया गया है, लेकिन हममें से अधिकांश पेड़ों की जड़ों में निर्माल्य का विसर्जन करने से कतराते हैं। अगर हम भगवान को चढ़ाए गए फूलों का सार्थक उपयोग कर सकें और जलस्रोतों में होने वाले प्रदूषण की रोकथाम कर सकें तो अधिक उत्तम होगा।