भारतीय संस्कृति का एक सूत्र में पिरोने का कार्य आदि गुरू शंकराचार्य ने किया – स्वामी अखिलेश्वरानंद

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भोपाल  – ईपत्रकार.कॉम |आज बैरसिया तहसील मुख्यालय पर एकात्म यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। यहां यात्रा कल सायं विदिशा जिले से पहुंची थी। बैरसिया में आज आदि शंकराचार्य की चरण पादुकाओं के साथ नगरवासियों ने लगभग सात किलोमीटर नगर भ्रमण किया। नगर यात्रा में क्षेत्रीय विधायक श्री विष्णु खत्री, स्वामी अखिलेश्वरानंद, म.प्र. में यात्रा के समन्वयक श्री विजय दुबे, खनिज विकास निगम के अध्यक्ष श्री शिव चौबे,जिला पंचायत अध्यक्ष श्री मनमोहन नागर तथा अन्य जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया।

बाद में बैरसिया स्थित दशहरा मैदान में आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद ने कहा कि उपासना पद्धति अलग होने के कारण भिन्न- भिन्न धर्मों को अलग अलग नाम से जाना जाता है। सभी धर्म सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि आदि गुरू शंकराचार्य के अद्धैत दर्शन ने विश्व को विविधताओं से परे एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है। एकात्म यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में इस यात्रा की गूंज है। आदि गुरू शंकराचार्य हमारे धर्म और संस्कृति के आधार स्तंभ हैं। आज जहां लोग एक दूसरे से सामाजिक कुरीतियों और पाखंड के आधार पर अलग हो रहे हैं, उन्हें एक मंच पर लाकर समरसता का संदेश देना है।

म.प्र.के एकात्म यात्रा के समन्वयक श्री विजय दुबे ने यात्रा के उद्धेश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 22 जनवरी वसंत पंचमी के अवसर पर ओंकारेश्वर में बनने वाली 108 फुट की अष्टधातु की प्रतिमा स्थापना हेतु भूमि पूजन किया जायेगा। जहां प्रदेश के कौने- कौने से लाई गई मिट्टी से नींव डाली जायेगी। उन्होंने अपेक्षा की प्रदेश का हर नागरिक एकात्म यात्रा से जुड़े़।

अपने स्वागत भाषण में विधायक श्री विष्णु खत्री ने सनातन धर्म को पुर्नस्थापित करने में आदि गुरू शंकराचार्य का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य का दर्शन विश्व को एक सूत्र में बांधता है। भारत की आध्यात्मिक शक्ति के सतत प्रवाह को सशक्त रूप में प्रवाहमान रखने के लिये शंकराचार्य की भूमिका विशेष महत्वपूर्ण रही है। उनके विचारों को जीवंत रखने के लिए मध्यप्रदेश में एकात्म यात्रा निकाली जा रही है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में शंकराचार्य की प्रतीकात्मक चरण पादुका और भारतीय संस्कृति के प्रतीक ध्वज की स्थापना की गई। इस अवसर पर सामूहिक भोजन का आयोजन किया गया, जिसमें समाज के सभी वर्गों ने भाग लिया।