परम्परा व कलाओ को बनाते नही जीते है जनजातीय – श्री बालमुकुंद

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बड़वानी – ईपत्रकार.कॉम |भारत के इतिहास को यूरोप की दृष्टि से देखते है, भारत का इतिहास पुराणो मे है, जिसमे प्रमाण की आवश्यकता नही है। हमारे यहां पर माता -पिता के अनुभव व जानकारी पर नई पीढ़ी समझती है, हमारे इतिहास को कमरे मे बैठकर लिखा गया, गलत जानकारी दी गई। भारत का इतिहास गिरी मे है, जनजातीय क्षैत्र मे है, जनजातीय परंपरा व कलाओ को बनाते नही उसमे जीते है।

उक्त विचार डॉ बालमुकुंद राष्ट्रीय संगठन सचिव अखिल भारतीय इतिहास संकलन ने दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर ग्राम अंबापानी मे व्यक्त किये। उन्होने कहा कि जनजातीय कम आवश्यकता मे जीते है, कोई सुविधा मिले या न मिले। शहीद भीमा नायक जानते थे कि वह अंग्रेजों से नही जीत सकते मगर युद्ध किया, वैसे ही रामायण मे जटायु जानते थे कि वह रावण से नही जीत सकते मगर माता सीता के लिए युद्ध किया। उँचा भूल ने महाराणा प्रताप के लिए लड़े, ऐसी धर्म व राष्ट्र के लिए लड़ने वाला जनजातीय समाज है।

डॉ. हर्षवर्धन शैत्रिय संगठन ने कहा कि वनवासी जीवन मूल रुप से हिन्दुत्व का आधार है, समापन कार्यक्रम मे संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सद्स्य मधू भाई कुलकर्णी, श्री काले वनवासी कल्याण आश्रम क्षेत्रिय संगठन मंत्री, विभाग प्रचारक निखिलेश माहेश्वरी, संतोष बघेल विभाग सेवा प्रमुख, पूर्व केन्द्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते, सांसद श्री सुभाष पटेल, श्री गजेन्द्र पटेल प्रदेशाध्यक्ष भाजपा अजा मोर्चा, सहित गण व विद्वान मौजूद थे। आभार कार्यक्रम संयोजक प्रो. सूमेर सिंह सोलंकी ने माना।

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