परिवार की दशा सुधार देती है दशामाता की पूजा

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प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव बने रहते हैं। कई लोगों के जीवन में यह कम समय के लिए आते हैं, तो कई लोग जीवनभर परेशानियों से जूझते रहते हैं। ऐसे में उनके परिवार की, जीवन की दशा बिगड़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन की दशा बिगड़ी हुई होती है तो उसे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है, और जब दशा अच्छी होती है तो उसका जीवन सुखद होता है। जीवन की इसी बिगड़ी हुई दशा को सुधारने के लिए दशामाता का पूजन किया जाता है।

दशामाता का पूजन
चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के दिन दशामाता का पूजन किया जाता है। यह व्रत 18 मार्च 2020, बुधवार को किया जाएगा। इस दिन महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा लाकर उसमें 10 गांठ लगाती है और पीपल के पेड़ की पूजा करती है।

व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय राजा नल और रानी दमयंती सुखपूर्वक राज्य करते थे। उनके दो पुत्र थे। राज्य की प्रजा सुखी थी। एक दिन की बात है। एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा कि दशा माता का डोरा ले लो। दासी बोली- हां महारानी जी, आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता की पूजा और व्रत करती है और इस डोरे को गले में बांधती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है। रानी ने वह डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजा करके गले में बांध लिया। कुछ दिनों बाद राजा नल ने दमयंती के गले में डोरा बंधा देखा तो पूछा कि इतने आभूषण होने के बाद भी तुमने यह डोरा क्यों बांध रखा है और यह कहते हुए राजा ने डोरा गले से खींचकर निकालकर फेंक दिया। रानी ने डोरा उठाते हुए कहा कि यह दशामाता का डोरा है, आपने उसका अपमान करके अच्छा नहीं किया।

दशामाता एक बुढि़या के रूप में आई
रात्रि में राजा के स्वप्न में दशामाता एक बुढि़या के रूप में आई और राजा से कहा कि तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है। तूने मेरा अपमान किया है। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, धीरे-धीरे राजा के ठाठ-बाट, धन-धान्य, सुख-समृद्धि नष्ट होने लगे। दशा इतनी बुरी हो गई कि राजा को अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में भेष बदलकर काम मांगने जाना पड़ा। रास्ते में राजा को एक भील राजा का महल दिखाई दिया। वहां राजा ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर सुरक्षित छोड़ दिया और राजा-रानी आगे बढ़ गए। राजा के मित्र का गांव आया। वे मित्र के यहां गए तो उनका खूब आदर-सत्कार हुआ। मित्र ने अपने शयनकक्ष में सुलाया। उसी कमरे में मोर की आकृति की खूंटी पर मित्र की पत्नी का हीरों जड़ा कीमती हार टंगा था। मध्यरात्रि में रानी की नींद खुली तो देखा किया वह बेजान खूंटी हीर को निगल रही है। यह देख रानी ने तुरंत राजा को जगाकर दिखाया और दोनों ने विचार किया किया सुबह मित्र को क्या जवाब देंगे। अतः इसी समय यहां से चले जाना चाहिए। रानी-राजा रात में ही वहां से चले गए। सुबह मित्र की पत्नी को हार नहीं मिला तो उन्होंने राजा पर चोरी का आरोप लगाया। इस प्रकार राजा नल और रानी दमयंती के जीवन में अनेक कष्ट आते रहे।

राजा नल को वही स्वप्न वाली बुढि़या दिखाई दी
एक दिन वन से गुजरते समय राजा नल को वही स्वप्न वाली बुढि़या दिखाई दी तो वे उसके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे और बोले माई मुझसे भूल हुई क्षमा करो। मैं पत्नी सहित दशामाता का पूजन करूंगा। बुढि़या ने उसे क्षमा करते हुए दशामाता का पूजन करने की विधि बताई। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आने पर राजा-रानी ने अपनी सामर्थ्य अनुसार दशामाता का पूजन किया और दशामाता का डोरा गले में बांधा। इससे उनकी दशा सुधरी और राजा को पुनः अपना राज्य मिल गया।

कैसे करें दशा माता का व्रत…

1. यह व्रत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है।

2. सुहागिन महिलाएं यह व्रत अपने घर की दशा सुधारने के लिए करती हैं।

3. इस दिन कच्चे सूत का 10 तार का डोरा, जिसमें 10 गठानें लगाते हैं, लेकर पीपल की पूजा करती हैं।

4. इस डोरे की पूजन करने के बाद पूजनस्थल पर नल-दमयंती की कथा सुनती हैं।

5. इसके बाद डोरे को गले में बांधती हैं।

6. पूजन के पश्चात महिलाएं अपने घरों पर हल्दी एवं कुमकुम के छापे लगाती हैं।

7. एक ही प्रकार का अन्न एक समय खाती हैं।

8. भोजन में नमक नहीं होना चाहिए।

9. विशेष रूप से अन्न में गेहूं का ही उपयोग करते हैं।

10. घर की साफ-सफाई करके घरेलू जरूरत के सामान के साथ-साथ झाडू इत्यादि भी खरीदेंगी।

11. यह व्रत जीवनभर किया जाता है और इसका उद्यापन नहीं होता है।