जोक्स और शायरी कौन सा वो ज़ख्मे-दिल था जो तर-ओ-ताज़ा न था, By Editor - March 26, 2019 0 कौन सा वो ज़ख्मे-दिल था जो तर-ओ-ताज़ा न था, ज़िन्दगी में इतने ग़म थे जिनका अंदाज़ा न था, ‘अर्श’ उनकी झील सी आँखों का उसमें क्या क़ुसूर, डूबने वालों को ही गहराई का अंदाज़ा न था।