प्रधानमंत्री कुछ भी प्रचार करें, भारत-रूस संबंधों की बुनियाद नेहरू के समय पड़ी थी : कांग्रेस

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कांग्रेस ने भारत-रूस संबंधों को देश की विकास यात्रा का अहम हिस्सा बताते हुए शुक्रवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ”अपना प्रचार के करने के बावजूद” सच यही है कि दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत नींव तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर में पड़ी थी तथा 1950 से 1980 के दशक के बीच इसे और मजबूती मिली।

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने बिक्स शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री मोदी और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की द्विपक्षीय बैठक के बीच यह भी कहा कि सोवियत संघ 1950 के दशक में शुरू हुई भारत की विकास यात्रा में एक ”अमूल्य साझेदार” रहा और उसने इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, खनन, बिजली, तेल एवं गैस, रसायन, रक्षा, अंतरिक्ष तथा परमाणु उद्योग जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ”यह सहयोग नेहरू की जुलाई 1955 में सोवियत संघ की 16 दिवसीय यात्रा और उसके बाद सोवियत नेताओं निकोलाई बुल्गानिन तथा निकिता ख्रुश्चेव की नवंबर-दिसंबर 1955 में भारत की 20 दिवसीय यात्रा के बाद और मजबूत हुआ।” कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत और सोवियत संघ के बीच शांति, मैत्री एवं सहयोग की संधि पर नौ अगस्त 1971 को नयी दिल्ली में हस्ताक्षर हुए थे और यह संधि दो साल से अधिक समय तक चली बातचीत के बाद हुई थी। उन्होंने इसे ”बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक” कदम बताया।

रमेश के अनुसार, दिसंबर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत-रूस संबंधों में कुछ समय के लिए ठहराव आया, लेकिन 1998 में तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री येवगेनी प्रिमाकोव और उसके बाद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में संबंधों को नयी गति मिली। उन्होंने कहा कि भारत और रूस के बीच ब्रह्मोस मिसाइल की संयुक्त परियोजना करीब सात साल की प्रक्रिया के बाद पुतिन और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में अंतिम रूप ले सकी। बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इसका काफी विस्तार हुआ और नयी दिल्ली, हैदराबाद तथा तिरुवनंतपुरम में इससे जुड़े परिसरों की स्थापना की गई।

रमेश ने कहा, ”बात सीधी है कि नरेन्द्र मोदी के आत्म-प्रचार के बावजूद भारत और रूस के बीच मजबूत संबंधों का एक लंबा इतिहास रहा है और इसकी मजबूत नींव 1950 से 1980 के दशक के दौरान रखी गई थी।” उन्होंने यह भी याद किया कि रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने 22 दिसंबर 2010 को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बंबई का दौरा किया था और संस्थान के परिसर में मौजूद उस ”लगभग भुला दिए गए प्रतीक” को कुछ मिनट देखा था, जो करीब आधी सदी पहले भारत-सोवियत संबंधों की नींव के दौर में स्थापित हुआ था। रमेश ने उस स्थान की एक तस्वीर भी साझा की, जो आईआईटी बंबई परिसर में पीसी सक्सेना व्याख्यान कक्ष के पास स्थित है। उन्होंने कहा कि 1963 से 1975 तक यह स्थान उनके दैनिक जीवन का भी हिस्सा रहा था।

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