राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि संस्थाओं को अनुशासित और नैतिक रूप से सही होना चाहिए और ये पदासीन व्यक्तियों से ‘अधिक महत्वपूर्ण हैं। कोविंद ने अपने संबोधन में एक ऐसे समाज की पैरवी की जहां दूसरे की गरिमा का मजाक बनाए बिना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कोई भी व्यक्ति दूसरे से असहमत हो सकता है। उन्होंने कहा कि बेटियों को, बेटों की ही तरह, शिक्षा, स्वास्थ्य और आगे बढ़ने की सुविधाएं दी जाती हैं, ऐसे समान अवसरों वाले परिवार और समाज ही एक खुशहाल राष्ट्र का निर्माण करते हैं।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लड़कियों को हर क्षेत्र में समान अवसर दिलाने की सरकार की वचनबद्धता को दोहराते हुए कहा है कि इस संबंध में नीतियां तभी कारगर सिद्ध हो सकती हैं जब परिवार और समाज बेटियों की आवाज सुनेंगे। हमें परिवर्तन की इस पुकार को सुनना ही होगा।’
राष्ट्रपति ने स्वतंत्रता प्राप्ति और पहले गणतंत्र दिवस के बीच के दौर की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा, ‘यह दौर पूरी लगन, संकल्प और प्रतिबद्धता के साथ देश को संवारने और समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए किये गये निरंतर प्रयासों का दौर था। आज फिर हम एक ऐसे ही मुकाम पर खड़े हैं। एक राष्ट्र के रूप में हमने बहुत कुछ हासिल किया है परंतु अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। हमारे लोकतंत्र का निमार्ण करने वाली पीढ़ी ने जिस भावना के साथ काम किया था आज फिर उसी भावना के साथ काम करने की जरूरत है।






























































