जनजातीय इतिहास की भारतीय इतिहास – मधुभाई कुलकर्णी

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बड़वानी – ईपत्रकार.कॉम |जनजातीय इतिहास की भारतीय इतिहास है। भारतीय इतिहास का आरंभ जनजातीय इतिहास से होता है। वेदों की प्रकृति पूजक परम्परा आज भी जनजातीय समाज में देखने को मिलती है। अतिथि देवों भवः, सत्य बोलना, करूणा, दया, प्रेम आदि भारतीय मूल्य आज भी जनजातीय समाज में विद्यमान है।

उक्त बाते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य श्री मधुभाई कुलकर्णी ने ग्राम अम्बापानी में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठि ’’जनजातीय परम्परा में भारतीय दर्षन ’’ में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि इतिहास का लेखन जीवन मूल्यों के आधार पर होना चाहिए न कि राजाओं के कालखण्ड के आधार पर । उन्होंने कहा कि हमारे ऋषि मुनि एवं समस्त महापुरूष वनों में ही रहा करते थे। उन्होंने राम के जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि राम के जीवन में प्रेरणादायी कालखण्ड वनवासी राम का ही रहा है। कृष्ण भी गांव में एवं जनजातीयों के बीच में ही रहे है। पाण्डवों ने भी 13 वर्ष वनवास में ही बिताये है। इस प्रकार सभी महापुरूष वनवासी समाज के बीच में रहकर सम्पूर्ण समाज को प्रेरणा देते रहे हैं। जनजातीय समाज की महान जीवन संस्कृति ही भारतीय संस्कृति का आधार है।

कार्यक्रम में विषय प्रवेश कराते हुए डॉ. बालमुकुन्दजी ने कहा कि भारत का इतिहास लिखने वाले कभी भारत में आये ही नहीं। उन्होंने भारतीय इतिहास को तोड़कर रख दिया। हम भारत का इतिहास भारतीय चैतन्य के प्रकाश में लिखेंगे। जनजातीयों का इतिहास जनजातियों के मध्य रहकर लिखा जावेगा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास एक ही परिवार तक सीमित कर दिया गया है। जबकि इसमें भीमा नायक जैसे लाखों जनजातीयों के बलिदान को दबाने का शड़यंत्र किया गया है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ही कुल 3.50 लाख एवं कुल 7 लाख जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना बलिदान भारत की स्वतंत्रता के लिए दिया है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कपिल तिवारी जी ने कहा कि पश्चिमी इतिहासकारों ने शड़यंत्र कर इतिहास को दो भागों में बांट दिया है। ईसा पूर्व इतिहास को अवैज्ञानिक एवं तथ्यहीन तथा ईसा पश्चात् इतिहास वैज्ञानिक एवं तथ्यात्मक इतिहास बताया है। उन्होंने इतिहास को गलत ढंग से प्रस्तुत कर लिख दिया है। जिसे स्वतंत्रता पश्चात् अब ठीक करने एवं भारतीय दृष्टि से लिखने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय समाज संरचना में नागरीय, ग्राम लोक जीवन एवं आरण्यक तीनों संस्कृति आपस में जुड़ी हुई है। हमारी भारतीय संस्कृति का आधार महान जनजातीय संस्कृति से ही है।

डॉ. एस.पी. गौतम ने कहा कि रामायण काल में सभी देवी-देवताओं ने जनजातीय समाज में जन्म लिया है। तभी से जनजातीय संस्कृति का आरंभ हुआ है। हमारे सभी जनजातीय बन्धुओं उन्हीं देवी-देवताओं के वंशज है। डॉ. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि ऋग्वेद में उल्लेखित पांच जनजातियों से ही प्रकृति पूजक जनजातियों का विकास हुआ है। इस प्रकार हमारी जनजातियाँ ऋग्वेद की परम्परा का पालन करने वाली है।

उक्त जानकारी देते हुए संगोष्ठि के प्रचार समिति प्रमुख श्री जितेन्द्र निकुम ने बताया कि राष्ट्रीय संगोष्ठि का आरंभ पारम्परिक भारतीय जनजातीय नृत्य से सभी अतिथियों को टंट्या मामा द्वार से शहीद भीमा नायक बौद्धिक पाण्डाल तक ले जाकर हुआ। कार्यक्रम का आरंभ सभी धर्म ग्रन्थों का पूजन कर किया गया। तत्पश्चात् कु. आकृति जोशी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। सभी अतिथियों का स्वागत श्रीफल एंव पारम्परिक तीरकमान देकर कार्यक्रम के मुख्य संयोजक डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी, उनकी पत्नि श्रीमती मंजुला सोलंकी, प्राचार्य श्री एन.एल. गुप्ता एवं अम्बापानी सरपंच भीमा सोलंकी द्वारा किया गया। इसके उपरांत महाविद्यालय के ज.भा.स. अध्यक्ष राजेश पण्डित द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। संकल्प का वाचन संस्कृत भाषा में इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गिरीश भाई ठक्कर जी द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन ओमजी उपाध्याय द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मंच पर मुख्य अतिथि मधुभाई कुलकर्णी, सदस्य अखिल भारतीय कार्यकारिणी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, डॉ. बाल मुकुन्दजी पाण्डे, राष्ट्रीय संगठन सचिव अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नईदिल्ली, मुख्य वक्ता कपिलजी तिवारी न्यासी भारत भवन भोपाल, कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. रविन्द्र कान्हेरे कुलपति भोज मुक्त विश्वविद्यालय भोपाल, विशेष अतिथि प्रो. सुश्मिता पाण्डे अध्यक्ष-राष्ट्रीय स्मारक संस्थान दिल्ली, प्रो. सतीष चन्द्र मित्तल राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली, प्रो. विश्वकर्मा राष्ट्रीय महामंत्री, डॉ. एस.के. गौतमजी सदस्य लोकसेवा आयोग म.प्र., डॉ. तेजसिंह सैंधवजी, पुजारा बाबा, गांव पटेल अम्बापानी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम में विशेष रूप से संघ के श्री बलीराम पटेल सह प्रान्त प्रचारक एवं डॉ. प्रकाश शास्त्री प्रांतीय संघ चालक, राधेश्याम पाटीदार विभाग संघ चालक, विजयजी यादव, विभाग प्रचार प्रमुख, रविन्द्र कुलकर्णी जिला संपर्क प्रमुख आदि उपस्थित थे।

कार्यक्रम के अंत में वंदे मातरम् अनिलजी पाटीदार एवं नामदेवजी द्वारा गाया गया। आभार प्रदर्षन महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. एन.एल. गुप्ता द्वारा माना गया।

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