गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि देश को स्वतंत्र कराने में संतों के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का आरोप लगा। अंग्रेजो ने चौरी-चौरा काण्ड में महन्त दिग्विजयनाथ को आरोपी बनाया था। उन्होंने कहा कि संतों ने भी राष्ट्रधर्म को सबसे बड़ा धर्म माना है। संत स्वतंत्रता संग्राम के गवाह रहे हैं।
उन्होंने कहा संतों ने भी राष्ट्रधर्म को सबसे बड़ा धर्म माना है। संत स्वतंत्रता संग्राम के गवाह रहे हैं |उन्होंने कहा कि राष्ट्र की रक्षा भी सन्यासी का प्रथम कर्तव्य है। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वरों द्वारा प्रारंभ की गई यह परंपरा आगे भी निरन्तर चलती रहेगी। श्रीगोरक्षपीठ के एकमात्र शिल्पी महन्त दिग्विजयनाथ थे। नाथ संप्रदाय के बिखरे योगी समाज को एक किया। उन्हें धर्म, आध्यात्म के साथ-साथ राष्ट्रोन्मुख किया। हिन्दुत्व के मूल्यों और आदर्शो की स्थापना के लिए वे राजनीति में कूदे। योगी ने कहा कि राष्ट्रीयता का जो मंत्र उन्होंने दिया यदि उसे मान लिया गया होता तो आज पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववाद और कश्मीर में ये हालात नहीं होते। उन्होंने कहा कि वृहद हिन्दू समाज ही राष्ट्रीय एकता की गारन्टी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत-नेपाल संबंधों को आगे बढ़ाने के लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को बार-बार ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की सहायता लेनी पड़ी थी। ब्रह्मलीन महाराज के धर्म, राजनीति, शिक्षा, समाज के सन्दर्भ में विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य की ²ष्टि से अति पिछड़े इस पूर्वी उत्तर प्रदेश में उन्होंने शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं और तकनीकी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कर सामाजिक परिवर्तन में अपनी सक्रिय भागीदारी निभायी। उन्होंने कहा कि ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ ने महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत आन्दोलन के बाद कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति के विरूद्ध कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी राजनीति का शंखनाद किया। आज गोरखपुर में जो कुछ भी गौरव प्रदान करने वाली चीजें हैं उनमें पूज्य दोनों ब्रह्मलीन सन्तों का सर्वाधिक योगदान रहा।
गोरक्षपीठाधीश्वर ने कहा कि जब वाराणसी में विश्वनाथ जी के मन्दिर में दलितों का प्रवेश वर्जित था तब महन्त दिग्विजयनाथ ने अपने आन्दोलन के माध्यम से मन्दिर का दरवाजा सबके लिए खुलवाया। ब्रह्मलीन महन्त अवैद्यनाथ ने मीनाक्षीपुरम में दलितों को सम्मान दिलाने के लिए आन्दोलन किया तथा उनके साथ बैठकर सहभोज कर हिन्दू समाज को जोडऩे का काम किया।
































































