मन्नत पूरी करने के लिए इस मंदिर में दान किए जाते हैं बच्चे

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बचपन बर्बाद करने की एक ऐसी परंपरा जहां मासूम बच्चे न सिर्फ अपने माता-पिता से अलग कर दिए जाते हैं बल्कि सारी जिंदगी वो एक मंदिर में बिताने के लिए मजबूर हो जाते हैं और ये सब भगवान के नाम पर होता है। इस अजीबोगरीब परंपरा का नाम है ‘बच्चा दान’।

बच्चा दान के नाम पर सैकड़ों मासूमों के बचपन और उनकी पूरी जिंदगी से खिलवाड़ का ये सिलसिला बरसों से होता आ रहा है। लेकिन, अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आज तक इसके खिलाफ आवाज नहीं उठी। हैरानी की बात ये है कि आज भी माता पिता दो-दो साल के बच्चों को परंपरा के नाम पर हमेशा के लिए खुद से अलग कर देते हैं।

इन बच्चों का घर अब गुजरात के सुरेंद्र नगर में दुधरेज गांव का मंदिर है। इसे वडवाला मंदिर के नाम से जाना जाता है। ये मंदिर गुजरात के रबारी समुदाय का है। ये मंदिर रबारी समुदाय में काफी मशहूर है। इस मंदिर में बरसों से एक ऐसी अजीबोगरीब परंपरा चली आ रही है जिसे बच्चा दान कहते हैं।

बच्चा दान की ये परंपरा बेटा पाने की चाहत में होती है। परंपरा के मुताबिक यहां बेटे के लिए मन्नत मांगी जाती है। लोग यहां दो बेटे होने की मन्नत मांगते हैं। इसके बाद अगर उन्हें दो बेटे हुए तो वो छोटे बेटे को मंदिर में दान देते हैं।

परंपरा के नाम पर मासूमों की जिंदगी से हो रहे खिलवाड़ की खबर जब मिली तो एक टीम इस मंदिर में पहुंची। यहां पहुंचे तो सत्संग का वक्त हो चुका था। मंदिर के महंत कनिराम बापू आ चुके थे जो इस मंदिर के सर्वेसर्वा हैं। इनके आने पर हर बच्चा दंडवत करता नजर आता है। जब महंत से इस अजीबोगरीब परंपरा के बारे में पूछा तो उनका जवाब और भी हैरान करने वाला था।

निर्मोही अखाड़ा के महंत कनिराम बापू ने कहा कि हमको भी हमारे मां-बाप ने मन्नत के तौर पर यहां रखा था, हमसे पहले मंदिर के पुजारी ग़ुलाम बापू भी मन्नत में छोड़े गए थे, यहां सभी साधु मन्नत के मुताबिक ही रखे गए हैं। तकरीबन 10-15 हज़ार साधु मन्नत के तौर पर रखे गए हैं। कनिराम बापू के मुताबिक ये परंपरा काफी पुरानी है, लेकिन बदलते वक्त का इस परंपरा पर कोई असर नहीं हुआ है। आज भी लोग मन्नत पूरी होने पर अपने बच्चे को मंदिर में हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देते हैं।

सवाल ये है कि क्या किसी मंदिर को इस तरह मासूम बच्चों को रखने का हक है? क्या मंदिर में परंपरा के नाम पर जो हो रहा है…वो कानून का मुताबिक गलत नहीं है? क्या जो माता-पिता बच्चे को मंदिर में छोड़ रहे हैं, वो कानून के मुताबिक गलत नहीं कर रहे।

कैसे होती है परवरिश?

वडवाला के मंदिर में इस वक्त करीब 50 बच्चे हैं जिन्हें बच्चा दान के नाम पर मंदिर में छोड़ दिया गया है। वडवाला के मंदिर में छोड़े गए बच्चों की परवरिश मंदिर में ही होती है, लेकिन जिस तरह बच्चों के माता-पिता इन्हें मंदिर में दान देकर इनकी किस्मत का फैसला कर देते हैं। वैसे ही मंदिर भी इनके भविष्य का फैसला करता है। यानी ये बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे और क्या करेंगे, ये मंदिर ही तय करता है।

बच्चों की रज़ामंदी के बिना उनकी जिंदगी का फैसला करने की इस परंपरा की जड़ें काफी गहरी है। इस मंदिर के एक और पुजारी कोठारी स्वामी की जिंदगी की कहानी और भी हैरान करने वाली है। कोठारी स्वामी के माता-पिता ने ऐसी कोई मन्नत नहीं मांगी थी। बल्कि उनकी दादी ने अपने एक बेटे को मंदिर में दान देने की मन्नत मांगी थी, लेकिन मां की ममता की वजह से वो ऐसा नहीं कर सकी। इसके बाद कुछ ऐसा हुआ जिससे कोठारी स्वामी को मंदिर में दान दिया गया।

कोठारी स्वामी ने बताया कि दादी ने मन्नत मांगने के बाद दान नहीं किया। इसके बाद लोग बीमार पड़ने लगे, जब मन्नत की याद आई तब सभी बच्चे बड़े हो गए थे। पापा की शादी हो गई थी फिर वापस मन्नत रखी गई कि अब जो बेटा होगा उसे मंदिर में दान करेंगे। पिता की जगह फिर मुझे रखा गया।

यहां दान किए गए बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं वो मंदिर के कामकाज को संभालने लगते हैं। छोटे बच्चों की परवरिश भी इन्हीं के भरोसे होती है। इनके मुताबिक बच्चे शुरू-शुरू में घरवालों को ज़रूर याद करते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद सबकुछ ठीक हो जाता है।

कैसे रहते हैं बच्चे

इस मंदिर में बच्चों को बेहद कठिन अनुशासन में रखा जाता है। सुबह 6 बजे बच्चों को उठना होता है। इसके बाद नाश्ता कर कनिराम बापू के पास पूजा के लिए जाना होता है। फिर बच्चे स्कूल जाते हैं। शाम को बच्चों को खेलना होता है। इसके बाद संगीत सीखना भी ज़रूरी है। इसके बाद मंदिर में बड़ी आरती होती है जिसमें बच्चों को जाना जरूरी होता है।

मासूम बच्चों को इतने कड़े अनुशासन में रखने के बारे में जानकारों का मानना है कि ये बच्चों पर अत्याचार है, इसलिए बचपन को बर्बाद करने वाली ऐसी परंपराओं पर रोक लगनी चाहिए। कानून के जानकारों के मुताबिक ऐसी परंपरा कानून की कमजोरी की वजह से जारी है। क्योंकि इस पर लगाम लगाने के लिए कोई कारगर कानून है ही नहीं, लेकिन जरूरत इस बात की है कि कानूनों में बदलाव हो। ताकि बचपन की बर्बादी को रोका जा सके और इंसान को अपनी जिंदगी का फैसला लेने का हक मिले।