गर्भवती स्त्री रखें ध्यान, गर्भ रक्षा एवं श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के योग सूत्र

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गर्भावस्था में बच्चा अपनी माता के केवल प्रकट आचरण से ही प्रभावित नहीं होता, उससे तो बहुत हल्का असर बालक की मनोभूमि पर पड़ता है, अधिकांश प्रभाव तो मानसिक भावनाओं और विचारों का होता है।

सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक बहुत से संस्कार किए जाते हैं। जिनका मानव जीवन में विशेष महत्व है। पुरातन काल में गर्भाधान को षोड्स संस्कारों में से एक संस्कार माना गया था और उसे पूर्ण पवित्रता के साथ संपन्न करने की प्रथा प्रचलित थी। संतान का निर्माण माता-पिता भावभरे वातावरण में किया करते थे और जैसी आवश्यकता होती थी, उस तरह की संतान समाज को दे देते थे।
गर्भाधान से बाद के शकुन
* गर्भ रहने पर स्त्री को अपनी दिनचर्या संयमित रखनी चाहिए। आहारादि के संबंध में भी सजग रहें तथा सदैव प्रसन्न चित्त रहें। क्रोध, शोक, चिंता आदि का पूर्ण रूप से त्याग करें।

* यदि गर्भवती स्त्री भूख लगने पर भोजन नहीं करती तो यह न तो उसके स्वयं के पक्ष में उचित है और न संतान के पक्ष में ही। गर्भवती के अधिक भूखी रहने से उसकी संतान कमजोर और अल्पायु वाली होती है।

* यदि गर्भवती स्त्री अत्यंत चटपटे, अत्यंत खट्टे, अत्यंत कड़वे अथवा खारे पदार्थों का सेवन करे तो वह भी संतान के कमजोर और अल्पायु होने का कारण होगा।

* यदि गर्भवती स्त्री किसी अन्न को चक्की से दले अथवा मूसल से कूटे तो भी उसका प्रभाव संतान की शक्ति व आयु दोनों पर पड़ता है।

* यदि गर्भधारण के बाद स्त्री बहुत गर्म अथवा बहुत ठंडे पानी से स्नान करे तो उसका प्रभाव भी गर्भस्थ शिशु पर पड़ेगा।

* यदि कोई गर्भवती स्त्री घर की देहरी पर बार-बार जा बैठे तो यह लक्षण ठीक नहीं होता।

* यदि वह अपने शरीर पर कस्तूरी आदि पदार्थों का लेप करे, तेल की मालिश कराए अथवा मूत्र त्याग करते समय बार-बार अपने ही मूत्र में थूके, सोते समय अपने दांतों को पीसे, ऊंट, घोड़ा, हाथी की सवारी करे या फिर हाल ही में ब्याही गई गाय या भैंस का दूध पीए तो भी अनुचित और अशुभ है।

* यदि गर्भवती स्त्री धरती को बार-बार मस्तक लगाकर प्रणाम करे अथवा तेजी से ऊंचे स्थान पर चढ़े अथवा कसरत आदि व्यायाम करे तो भी संतान कमजोर और अल्पायु होती है।

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